Tuesday, September 11, 2018

加州空气污染每年花费280亿美元

路透社》报道一份研究说,美国人口最多的州——加利福尼亚每年花费280亿美元用于处理洛杉矶和圣华金山谷的空气污染导致的疾病。相关病情程度不同,轻则是短期休病假,重则为呼吸困难和过早死亡。
《路透社》报道一份研究说,美国人口最多的州——加利福尼亚每年花费280亿美元用于处理洛杉矶和圣华金山谷的空气污染导致的疾病。相关病情程度不同,轻则是短期休病假,重则为呼吸困难和过早死亡。

加利福尼亚州立大学简·荷尔的报告指出,化石能源的排放物是导致健康问题的主要原因。她说:“我们需要找到使石油变清洁的方法,让交通更有效率。我们需要减少在这两个盆地使用化石原料。”

洛杉矶空气污染带来的花销是平均每年每人1,250美元,圣华金山谷是个农业中心,每年的花销超过1,600美元。
据英国《卫报》报道,环境保护者称上千吨二恶英被巴卡斯卡纸张和纸浆厂倾倒进世界上最深的湖——西伯利亚的贝加尔湖,他们经过40年的努力,终于迫使这一工厂停产、倒闭。

这一造纸厂的负责人是亿万富翁杰里帕斯卡。他说,工厂已停产,1,400名工人被裁员。

在环保组织的努力下,纸浆厂于今年9月形成了一个“封闭性”的水系统,废物不能被排入湖水。这就意味着工厂必须停止生产其最获利的产品——漂白纸浆。在国际金融危机的影响下,该纸浆厂只得关闭。

绿色和平俄罗斯分部总监罗曼·瓦什科夫说,这个工厂的关闭日是个“历史性的时刻”。路透社》报道国际能源机构的年度报告说,世界各国必须采取极端的措施避免气候变暖带来的严重影响。该报告肯定了普遍的担忧,认为政府机构对气候问题的重视程度不够。
国际能源机构为28个发达国家提供咨询。报告提出了为避免气温升高2或者3摄氏度,需要各国对化石能源以外的其他能源每年提供高额投资。遵循这两种情景可使我们在本世纪末以前实现负排放,即被捕捉的温室气体量高于排放量。

该报告说,仅依赖二氧化碳减排差额量的逐渐增加不足以减少气候变暖的危险性。我们需要另外依赖科技和种植更多的森林,捕捉到植被在地下腐蚀过程中释放的二氧化碳。然而,这项技术尚未成熟。

去年联合国的气候专家提出,如果气温升高超过2度,将会对全球的食物和水的供应带来恶劣后果。国际能源机构的报告估计,将气候变化导致的气温上升控制在不超过2摄氏度的范围内代价将会非常高昂,需要在 - 年关闭废旧的化石能源发电厂,其费用高达3万6千亿美元。
据《路透社》报道,国际农业生产者联盟要求为农民制定特别条款,以确保农民不由于减排温室气体的努力而支付额外费用。虽然农业活动产生出20%的温室气体排放量,但是农民可以实现的减排程度受到限制。

组织主席阿哲·瓦什 说, 应该设计一个可以让农民有效参与的碳交易市场。农民不应在减排活动中被排除在外。而且,政府应该认识到他们在粮食种植中起到的重要作用,并奖励那些较好低保护了土地和野生动植物栖息地的农民。

他说,这是一个重要时刻,我们必须认识到现状。澳大利亚70%的农业温室气体排放量是由牛、羊胀气和粪肥产生的,共占该国11%的温室气体排放量。

各国环境部长将于2009年在哥本哈根会晤,讨论减少温室气体排放的后《京都议定书》协议。《京都议定书》将于2012年到期。
英国议会敦促中国政府关闭引起广泛争议的老虎养殖"农场"。约有5,000只老虎在中国被圈养,比野生老虎的数量还要多。中国的商业团体强烈抗议开放贩售虎制品交易市场。

前环境大臣伊略特·默雷说:“开放虎制品交易市场对于已面临灭绝的老虎种群来说是灾难性的,国际社会团体已尽最大努力说服中国关闭老虎养殖场。现在我们需要英国和欧盟参与并提升这个议题的重要性。”

环境组织担心结束15年的虎制品禁令将会导致偷猎的增加,而老虎种群已濒临灭绝。

传统中医药联合会的马伯英说:“我们强烈支持老虎保护,保证不进口、不出售以及不使用任何虎制品。”他将于周四在伦敦出席由默雷举行的“行动号召”并发言。他说:“我们反对任何以中药为借口的虎制品交易。虎制品不是中药的必需品。”

马伯英指出,中国在20世纪80年代就出台了保护濒危动物法律。

Friday, September 7, 2018

मोहन की मां शांताबाई तज़ाणे किसान थीं

. सितम्बर  में उन्होंने खेती के लिए लिया गया कर्ज़ा न चुका पाने की वजह से ख़ुदकुशी कर ली. आज मोहन मज़दूरी करके अपने दो बच्चे और पत्नी का पेट पालते हैं. उनकी पत्नी तीसरे बच्चे से गर्भवती है. लेकिन मोहन अपने तीसरे बच्चे को किसी रिश्तेदार को गोद देने का मन बना चुके हैं. उदास आंखों से अपने छोटे बेटे को गोद में लेते हुए वह कहते हैं कि उनके पास तीसरे बच्चे को पालने के संसाधन नहीं हैं.
लेकिन मोहन के इस तीसरे बच्चे की क़िस्मत तो 2011 में उस वक़्त ही तय हो गयी थी, जब मोहन के किसान पिता बाबूराम प्रहलाद तज़ाणे ने बढ़ते कर्ज़ के कारण आत्महत्या की थी.
इसके बाद मोहन की माँ ने घर की बागडोर अपने हाथ में ली. वह किसान की भूमिका में आईं और अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती करने लगीं. पर फ़सल के ठीक दाम नहीं मिले और कर्ज़ ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
इस बीच उनके गांव में किसानों का आत्महत्या करना जारी रहा. तभी मार्च 2015 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस मोहन के गांव आए. गाड़ियों का इतना लम्बा काफ़िला मोहन को आज भी याद है.
“पूरे गांव में अफ़रा तफ़री मच गयी. बताया गया कि मुख्यमंत्री गांव का दौरा करेंगे और रात को भी यहां रुकेंगे. हमें लगा अब हमारी मुश्किलें कम हो जाएँगी. देवेंद्र फडनवीस मेरे घर भी आए थे. उन्होंने घर की हालत देखकर कहा कि ‘अरे, इसकी परिवार की हालत तो बहुत ख़राब है.’ फिर उन्होंने कहा कि वह मुझे मदद में कुंआ देंगे. मैंने कहा मुझे धड़क योजना में कुंआ दे दो. उन्होंने कहा- धड़क नहीं, रोज़गार योजना में देंगे. फिर रोज़गार योजना में मुझे कुंआ जारी हुआ. मैंने अपनी तरफ़ से भी कर्ज़ा ले लेकर पैसे लगाए लेकिन कुएँ में आज तक पानी नहीं है”.
‘धड़क योजना’ महाराष्ट्र सरकार की एक जन-कल्याण स्कीम है. इसके तहत किसानों को सरकारी ख़र्च पर कुंआ बनवाकर दिया जाता है. इस योजना के तहत गांव में कुंआ बनवाने के लिए ‘किसान आत्महत्या’ की घटनाओं वाले परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है. मोहन के परिवार को ‘धड़क योजना’ की बजाय मनरेगा योजना के तहत कुंआ दिया गया. इसके तहत ज़मीन देने से लेकर मज़दूर जुटाने तक का सारा काम ग्राम पंचायत और क्षेत्र में मनरेगा के नोडल अधिकारी के पास आ गया. मोहन के अनुसार प्रशासनिक लचरता, कभी मज़दूरों की कमी तो कभी मशीनों की गैर-मौजूदगी की वजह से उनके कुंए का काम पूरा नहीं हो पाया. क़र्ज़ जस का तस बना रहा.
“धड़क योजना हमको आसान पड़ती पर उसमें कुंआ मिला नहीं. मनरेगा में तो काम ठीक से होता नहीं. इसलिए कुंआ तो पूरा बना नहीं. क़र्ज़ बढ़ता ही गया. मेरी माँ खेती करती तो मुनाफा नहीं होता. 70 हज़ार निवेश करते तो 45 हज़ार मिलता. नुकसान ही नुकसान. मां परेशान रहती थी. फिर सितम्बर 2015 में उस दिन मैंने मां से पूछा कि कर्ज़ा कैसे चुकाएंगे. मां ने कहा कि वो नया कर्ज़ा लेने की कोशिश करेगी. कुछ नहीं हुआ तो हम अपनी ज़मीन किराए से खेती के लिए दे देंगे. इसी सोच में मैं खाना खाकर गांव में टहलने निकला. लौट के आया तो देखा मां घर में नहीं थी. सब जगह ढूँढा पर मां नहीं मिली. फिर गांव के बाहर के कुंए पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुंए के बाहर पड़ी थी”.
शांताबाई की मौत के बाद प्रहलाद को मुआवज़ा में एक लाख रुपये मिले, जिससे उन्होंने अपना कर्ज़ा चुकाया. आज खेती के बारे में पूछने पर उनके चेहरे पर व्यंग्य में डूबी एक हंसी रहती है.
वह मुस्कुराते हुए मुझसे कहते हैं, “मैं अपनी पांच एकड़ ज़मीन अब किराए पर दे देता हूँ. ख़ुद खेती नहीं करता क्योंकि उसमें सिर्फ़ नुकसान है. मुझे रोज़ का 100 रुपया मज़दूरी मिल जाती है, उसी से अपना घर चलाता हूँ”.
अलविदा कहते हुए वह दुख में डूबी आवाज़ में जोड़ते हैं, “ज़मीन के किराए से कर्ज़ा चुका रहा हूँ. खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
गांव छोड़ने से पहले मेरी मुलाक़ात गांव के युवा सरपंच मंगेश शंकर ज़हरीले से होती है. गांव में बढ़ती किसान आत्महत्याओं के बारे में पूछने पर वह ग़ुस्से में कहते हैं, “मुख्यमंत्री गांव में आए और सिर्फ़ पेपरबाज़ी और नाश्ता करके चले गए. मुख्यमंत्री के गांव को गोद लेने के बाद भी काम क्या हुआ- एक सड़क और एक बस स्टैंड. किसानों को जिस मदद की ज़रूरत थी, वह तो मिली ही नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो मैं इतना दुखी हूं कि अब शिकायत भी नहीं करना चाहता. चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि सब किसानों का कर्ज़ा माफ़ करेंगे. अभी तक नहीं हुआ. इस गांव में 42 किसानों ने जान दी पर अब तक सिर्फ़ 12 परिवारों को ‘किसान आत्महत्या’ परिवारों को मिलने वाले लाभ मिले. बाक़ी को कागज पर सरकार ने माना ही नहीं. सिर्फ़ चाय पर चर्चा करने से किसान की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती”.
यवतमाल गांव में मेरी मुलाक़ात क्षेत्र में किसानों के मुद्दों पर बीते एक दशक से काम कर रहे देवेंद्र राव पवार से होती है.
विदर्भ में कभी न ख़त्म होने वाली किसान आत्महत्याओं के सिलसिले के बारे में वह कहते हैं, “शर्म की बात है कि हरित क्रांति के जनक वसंत राव नाइक का ज़िला आज किसानों की क़ब्रगाह में तब्दील हो गया है. 20 मार्च 2014 को नरेंद्र मोदी यहां आए थे. उन्होंने यहां से किसानों से वादा किया कि अगर उनकी सरकार आएगी तो वह स्वामीनाथन कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करेंगे और किसानों को 50 फीसदी मुनाफ़े पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाएंगे. उन्होंने कहा था कि उनके शासन में एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा. लोगों ने भरोसा करके उनको चुना पर नतीजा क्या हुआ? साल में जितने दिन होते हैं, उससे भी ज़्यादा किसान यवतमाल में हर साल आत्महत्या कर रहे हैं”.
देवेंद्र ने क़र्ज़माफ़ी के लिए हाल ही में शुरू की गई महाराष्ट्र सरकार की ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर (किसान) सम्मान योजना’ का ज़िक्र भी किया. इस योजना के तहत जिन भी किसानों ने 1.5 लाख या उससे कम क़र्ज़ लिया है, उसे माफ़ किए जाने का प्रावधान है. लेकिन कागज़ों पर जन-कल्याण का मोती लगने वाली इस योजना का ज़मीन पर पालन नहीं हो रहा है.
ताज़ा उदाहरण यवतमाल के पंडरकवड़ा तहसील के वागधा गांव में रहने वाला रेणुका चौहाण का परिवार है. अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाली महिला किसान रेणुका चौहाण ने मई 2018 में ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली. उनके परिवार में उनके 3 बेटे, पति और विकलांग सास-ससुर हैं. रेणुका की मृत्यु के बाद से उनके पति भी अपनी मानसिक स्थिरता खो बैठे हैं.
रेणुका के परिवार ने खेती के लिए 60 हज़ार रुपये का क़र्ज़ लिया था लेकिन फ़सल में कीड़े लग जाने की वजह से वो कर्ज़ चुका नहीं पाए. ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर सम्मान योजना’ के तहत जब वह अपने कर्ज़ माफ़ी की गुहार लेकर कलेक्ट्रेट गयीं तब उसका सिर्फ़ 15 हज़ार क़र्ज़ माफ़ किया गया.
रेणुका के सबसे बड़े बेटे अंकुश बताते हैं, “कागज़ों पर हमारा क़र्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार क़र्ज़ था. जिन माइक्रो फ़ाइनेंस कम्पनियों से हमने क़र्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़ हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद मां बच जाती”.
जब हमने अंकुश के घर से विदा ली तब तेज़ बरसात हो रही थी. अपने छोटे से घर की छत में बने सुरागों से गिरते पानी को देखते हुए अंकुश का चेहरा अपने अनिश्चित भविष्य की तरह ही अनिश्चित लग रहा था.