शिनजियांग से सीधी ख़बरें आना बहुत मुश्किल है. वहां मीडिया पर पाबंदी
है. लेकिन बीबीसी ने कई बार इस क्षेत्र से रिपोर्ट्स जुटाई हैं और ख़ुद इन
कैंपों के सबूत देखे हैं.
बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़नाइट ने कई ऐसे लोगों से भी बात की है जो इन जेलों में रह चुके हैं. ऐसे ही एक शख़्स हैं आमिर. आमिर ने बीबीसी को बताया - ''वो मुझे सोने नहीं देते थे. मुझे कई घंटों तक लटका
कर रखा जाता था. मेरी चमड़ी में सूइयां चुभाई जाती थीं. प्लास से मेरे
नाख़ून नोचे जाते थे. टॉर्चर का सारा सामान मेरे सामने टेबल पर रखा जाता था
ताकि में ख़ौफ़ज़दा रहूं. मुझे दूसरे लोगों के चीखने की आवाज़ सुनाई देती
थी.''
अज़ात नाम के अन्य पूर्व क़ैदी ने बताया - '' जहां मैं क़ैद
था, वहां डिनर के वक़्त करीब 1,200 लोग हाथों में प्लास्टिक की कटोरियां
लेकर चीन समर्थक गीत गाते थे. वो सब रोबोट की तरह दिखते थे. उनकी तो आत्मा
ही मर गई थी. मैं उनमें से कई लोगों को जानता हूं. वो सब ऐसे व्यवहार करते
थे कि जैसे कि कार दुर्घटना में अपनी यादाश्त खो चुके हों.''
चीन का कहना है कि उसे अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है क्योंकि कुछ वीगर लोगों ने इस्लामिक स्टेट समूह के साथ हथियार उठा लिए हैं.
साल में शिनजियांग की राजधानी ऊरूमची में हुए दंगों में हान समुदाय
के 200 लोग मारे गए थे. उसके बाद से यहां हिंसा बढ़ी है. जुलाई में
पुलिस स्टेशन और सरकारी दफ़्तरों पर हुए हमलों में 96 लोग मारे गए थे.
अक्तूबर
2013 में बीजिंग के तियाननमेन स्क्वायर में एक कार भीड़ में घुसी और कई
लोगों के कुचल दिया. चीनी प्रशासन ने इसके लिए भी शिनजियांग के
अलगाववादियों को ज़िम्मेदार बताया गया था.
सरकार की ताज़ा कार्रवाई के पीछे फ़रवरी में शिनजियांग के ऊरूमची में हुई छुरेबाज़ी की घटनाएं हैं.
चीन का कहना है कि शिनजियांग में 'हिंसक आतंकवादी गतिविधियों' से निपट रहा है.
जिनेवा में एक संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में चीनी अधिकारी हू लियानहे ने कहा था
कि दस लाख लोगों को हिरासत में रखे जाने की बात 'कोरा झूठ' है.
हाल
ही में चीन के मानवाधिकार विभाग के एक अधिकारी ने कहा है, "आप कह सकते हैं
कि ये तरीका सबसे उपयुक्त नहीं है लेकिन धार्मिक चरमपंथ से निपटने के लिए
ऐसा किया जाना ज़रूरी है. क्योंकि पश्चिम के देश इस्लामी चरमपंथ से लड़ने
में असफल हो गए हैं. बेल्जियम और पेरिस में हुए हमले, इसका सबूत हैं.
पश्चिम इस विषय में असफल रहा है."
चीन अक्सर शिनजियांग पर कोई
सार्वजनिक राय नहीं देता. साथ ही शिनजियांग में बाहरी लोगों और मीडिया के
प्रवेश की पूरी तरह से नियंत्रित करता है.
दुनिया भर में वीगर समुदाय के प्रति चीनी रवैया की आलोचना बढ़ती जा रही
है. लेकिन अब तक किसी भी मुल्क़ ने आलोचना भरे शब्दों से आगे कोई क़दम नहीं उठाया है.
अमरीका में कांग्रेस की चीनी मामलों की कमेटी ने ट्रंप
प्रशासन से शिनजियांग में मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ी कंपनियों और
अधिकारियों पर पाबंदी लगाने की गुहार की है.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट
में लिखा है - "अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को हिरासत में रखा जा रहा है.
उनका टॉर्चर हो रहा है. उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर पाबंदी
लगी हुई है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हर पहलू निगरानी में है." संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन की नई प्रमुख मिशेल बेशलेट ने भी शिनजियांग
में पर्यवेक्षकों को शिनजियांग में जाने देने की अनुमति मांगी है. चीन ने
इस मांग को सिरे से ख़ारिज करते हुए ग़ुस्से का इज़हार किया है.
मिसाल के तौर पर सीरिया में देखा जा सकता है. अमरीका लाख चाहता रहा कि
सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बाहर किया जाए, लेकिन रूसी
समर्थन ने उन्हें बचा लिया. अब दुनिया भले ही दो ध्रुवीय नहीं है, लेकिन कई
मामलों में रूस और चीन आज भी अमरीकी नेतृत्व को चुनौती देते दिखते हैं.
रूस
यूँ तो भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है, लेकिन उसकी क़रीबी हाल के वर्षों
में चीन से बढ़ी है. चीन और भारत के बीच 1962 में एक युद्ध हो चुका है और
भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. दोनों देशों के बीच आज भी सीमा
विवाद का समाधान नहीं हो पाया है. ऐसे में रूस और चीन की दोस्ती को भारत कैसे देखता है? चीन और रूस की दोस्ती का असर भारत पर क्या पड़ेगा?
भारत
और अमरीका में क़रीबी के कारण भी रूस और भारत के बीच दूरियां बढ़ी हैं.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2008-2012 तक भारत के
कुल हथियार आयात का 79 फ़ीसदी रूस से होता था जो पिछले पांच सालों में
घटकर 62 फ़ीसदी हो गया है.
वहीं कल तक जो पाकिस्तान हथियारों की
ख़रीद अमरीका से करता था अब रूस और चीन से कर रहा है. पाकिस्तान अपनी सैन्य
आपूर्ति की निर्भरता अमरीका पर कम करना चाहता है.
स्टॉकहोम
इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार अमरीका और पाकिस्तान के बीच का हथियारों का सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़ डॉलर तक
पहुंच गया है.
पूर्वी रूस और साइबेरिया में इस महीने की शुरुआत में
चीनी सेना एक युद्धाभ्यास में शामिल हुई. इसमें चीनी सेना के साजो-सामान भी
शामिल हुए थे. इसे 1981 के बाद का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास बताया जा रहा
है. इमेज कॉपीरइट दोनों देशों के इस सैन्य अभ्यास को चीन और रूस की नई रणनीतिक जुगलबंदी के तौर पर देखा जा रहा है. पश्चिम के कई पर्यवेक्षकों ने
तो इस युद्धाभ्यास को अमरीका के ख़िलाफ़ रूस और चीन की साझी तैयारी के तौर
पर पेश किया. कहा जा रहा है कि अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ जो ट्रेड
वॉर शुरू किया और रूस के ख़िलाफ़ जो आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, वैसे में
दोनों देशों का साथ आना लाजिमी है.
चीन और रूस के बीच पिछले 25
सालों में संबंधों में गर्माहट आई है. हालांकि दोनों देशों में और
के दशक में लड़ाई भी हुई है. सोवियत संघ के आख़िरी सालों से दोनों
देशों की क़रीबी बढ़ने लगी थी.
आज की तारीख़ में दोनों देशों के बीच
रणनीतिक साझेदारी है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने संयुक्त
राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए साथ
मिलकर कई बार वीटो पावर का इस्तेमाल किया है.
दूसरे विश्व युद्ध की
समाप्ति के बाद रूस और चीन का वो पक्ष कई बार खुलकर सामने आया है कि दुनिया बहुध्रुवीय रहे. मध्य-पूर्व में जब अमरीका, ईरान को लेकर कठोर होता है तो
रूस और चीन दोनों मिलकर उदार रुख़ का परिचय देते हैं.