لكن
السؤال الذي برز عبر مواقع التواصل في العالم العربي كان: وماذا عن آثارنا
العربية التي دُمرت؟ هذه لمحة عن أبرز المعالم والصروح الأثرية العربية التي خسرها العالم، نتيجة حروب وهجمات في المنطقة. الصحراء" إحدى ستة مواقع سورية أدرجتها منظمة اليونسكو على لائحة التراث العالمي.
لكن
بعد سقوط المدينة في قبضة تنظيم "الدولة الإسلامية" عام 2015، فجر التنظيم
عددا من المعابد وأبراج الدفن وقوس النصر،إضافة إلى واجهة المسرح الروماني
والتترابيلون.
ووصفت "يونيسكو" خسارة المعالم التراثية في المدينة بـ"جريمة حرب" - وهي عبارة تعكس حزن وغضب رواد مواقع التواصل حول الحدث.
أودت الحرب في سوريا بحياة مئات الآلاف ودمرت أحياء كاملة في مختلف أنحاء البلاد. لكن خسارة التراث الثقافي الغني في البلاد يعتبر ضحية كبيرة
للحرب.
ويعد الجامع الأموي في قلب المدينة القديمة من أبرز الضحايا التراثية وهو من أهم المعالم السورية والإسلامية.
وبعد
اشتباكات عنيفة في محيط وداخل باحة الجامع عام 2013، تهدمت مئذنة الجامع - وتبادلت الحكومة السورية والمعارضة الاتهامات حول مسؤولية الحدث.
وشكل تدمير الجامع صدمة شديدة. فبالإضافة إلى خسارة أكثر من ألف سنة من التاريخ، شبه سكان حلب الحدث بـ""فقدان أحد الأقارب".
مع اندلاع الحرب في اليمن، تعرضت العاصمة اليمنية صنعاء لتفجيرات انتحارية ولغارات جوية شنها التحالف الذي تقوده السعودية.
ونتيجة ذلك، تم تدمير العديد من مباني المدينة القديمة - المدرجة في قائمة التراث العالمي لليونسكو.
وتتميز
مدينة صنعاء القديمة بطراز معماري فريد، يعرف بالطراز الصنعاني، وهو
الدُور المبنية على النمط العمودي متعدد الطوابق، والذي يصل أحيانا إلى
ثمانية وتسعة طوابق.
بالرغم من الحزن على خسارة تراث مدينة صنعاء القديمة، أكد البعض على أن لا يجوز إلغاء كريثة على سبيل كارثة أخرى، قد
يعتبرها الشخص "أهم". وكتبت سحر: "لا منطق في مقارنة هذا الحزن بغيره، نعم كما حزنا على آثار اليمن، سنحزن بكل ما فينا من حضارة ورسالة
وعي على كاتدرائية نوتردام."
جامع النوري الكبير هو المكان الذي أعلن فيه أبو بكر البغدادي زعيم تنظيم الدولة إقامة ما وصفها بدولة "الخلافة" في عام 2014. لكن مسلحي التنظيم دمروا الجامع بعد ثلاث سنوات عندما أشرفت القوات العراقية
على الوصول إليه. ولم يتبق منه سوى قاعدة المئذنة وقبة تدعمها بضعة أعمدة.
ووصف رئيس الوزراء العراقي حيدر العبادي تدمير المسجد بـ"جريمة تاريخية"، نظرا للأهمية التاريخية والدينية للجامع.
पिछले तीन दिनों से अयोध्या एक बार फिर छावनी जैसी दिख रही है. चप्पे-चप्पे पर पुलिस, पीएसी और अर्धसैनिक बल
के जवान दिख रहे हैं. मुख्य सड़क पर बीच-बीच में सायरन बजाती सुरक्षाबलों
की गाड़ियां नज़र आ रही हैं.
ऐसा इसलिए है क्योंकि सरयू तट पर दीपावली से ठीक एक दिन पहले भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम होना है और क़रीब तीन
लाख दीये जलाने का रिकॉर्ड क़ायम करना है.
पिछले साल एक दिवसीय
दीपावली महोत्सव से उत्साहित राज्य सरकार ने इस बार कार्यक्रम तीन दिन का
कर दिया है. पिछले दो दिन से शहर में रामलीला समेत कई सांस्कृतिक कार्यक्रम
हुए और मंगलवार सरयू तट पर भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम होगा.
राम की पैड़ी पर सरयू घाट के दोनों ओर की सीढ़ियों के ऊपर मिट्टी के
दीये सजाकर रखे गए हैं और शाम को जैसे ही उनमें तेल भरकर उन्हें प्रज्ज्वलित किया जाएगा, पूरा घाट जगमग हो जाएगा. घाटों को वैसे भी पिछले
दो दिनों से रोशनी से नहलाने के लिए लेज़र बीमों और ख़ूबसूरत प्रकाश का
इस्तेमाल किया जा रहा है.
राज्य सरकार के आला अधिकारी पिछले क़रीब
दो हफ़्ते से तैयारियों का जायज़ा ले रहे हैं. इनमें राज्य के मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय, डीजीपी ओपी सिंह और अपर मुख्य सचिव सूचना अवनीश अवस्थी
भी शामिल हैं. इस बीच, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की पत्नी किम जोंग-सूक
सोमवार देर शाम लखनऊ पहुंच चुकी हैं.
बड़ी संख्या में वीआईपी आवागमन को देखते हुए सोमवार से ही सुरक्षा के
कड़े इंतज़ाम किए गए हैं. नया घाट के अंदर वाहनों के आने-जाने पर पाबंदी
सोमवार से ही लगा दी गई जबकि और जगहों पर भी वाहनों के आवागमन पर कड़ी
चौकसी रखी जा रही है.
राज्य के डीजीपी ओपी सिंह कहते हैं कि ये उनके लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसी दिन लखनऊ में भारत-वेस्टइंडीज़ के
बीच टी-20 मैच भी रखा गया है.
वहीं सोमवार देर रात तक अयोध्या की सड़कों पर चहल-पहल रही. कुछ लोग सरयू
घाट पर रोशनी और दीयों की सजावट देख रहे थे तो कुछ धनतेरस की ख़रीदारी में
व्यस्त थे. अयोध्या शहर के भीतर मुख्य मार्ग की सड़क पर मरम्मत कार्य भी चल रहा था. नया घाट के पास बर्तन की दुकान रखने वाले विष्णु कुमार कहते हैं, "इतनी भीड़-भाड़ और आवाजाही के चलते धंधा बैठ गया है. कई बार दुकान बंद रखनी पड़ती है. पुलिस की इतनी सक्रियता के चलते ग्राहक भी नहीं
आते, घर में ही रहने में भलाई समझते हैं."
कुछ लोगों से बात हुई तो कहने लगे कि पता नहीं दीपोत्सव उन्हें देखने को मिलेगा या फिर ये सिर्फ़ बाहर से आए मेहमानों के लिए ही होगा. साकेत कॉलेज
में बीए फ़ाइनल इयर के छात्र दिनेश वर्मा कहते हैं, "इतनी सुरक्षा
व्यवस्था है, इतने बड़े लोग आ रहे हैं, कहां हमें वहां जाने को मिलेगा.
दूसरे, इतनी चेकिंग लगाए हुए हैं कि वहां जाने से पहले आदमी दस बार सोचेगा."
अयोध्या में 6 नवंबर को होने वाले भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम के लिए सरयू तट का इलाका रंग-बिरंगी लाइटों और अन्य आकर्षक कृतियों से सजाया गया है.
पर्व की मुख्य अतिथि कोरिया गणराज्य की प्रथम महिला किम-जोंग-सूक की
उपस्थिति को यादगार बनाने की तैयारी की जा रही है.
इसके मद्देनज़र
अयोध्या के रामकथा संग्रहालय, रामकथा पार्क से लेकर सरयू तट और राम की
पैड़ी क्षेत्र में कई आयोजनों के माध्यम से इसे श्रद्धालुओं और यहां आने
वाले मेहमानों के लिए ख़ास बनाने की तैयारी की गई है. तय कार्यक्रम
के अनुसार राम राज्याभिषेक के बाद सरयू तट पर कोरिया और भारत के संबंधों को
मजबूत बनाने के लिए सामूहिक रूप से दीपदान से दीपोत्सव पर्व का शुभारंभ होगा.
शिनजियांग से सीधी ख़बरें आना बहुत मुश्किल है. वहां मीडिया पर पाबंदी
है. लेकिन बीबीसी ने कई बार इस क्षेत्र से रिपोर्ट्स जुटाई हैं और ख़ुद इन
कैंपों के सबूत देखे हैं.
बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़नाइट ने कई ऐसे लोगों से भी बात की है जो इन जेलों में रह चुके हैं. ऐसे ही एक शख़्स हैं आमिर. आमिर ने बीबीसी को बताया - ''वो मुझे सोने नहीं देते थे. मुझे कई घंटों तक लटका
कर रखा जाता था. मेरी चमड़ी में सूइयां चुभाई जाती थीं. प्लास से मेरे
नाख़ून नोचे जाते थे. टॉर्चर का सारा सामान मेरे सामने टेबल पर रखा जाता था
ताकि में ख़ौफ़ज़दा रहूं. मुझे दूसरे लोगों के चीखने की आवाज़ सुनाई देती
थी.''
अज़ात नाम के अन्य पूर्व क़ैदी ने बताया - '' जहां मैं क़ैद
था, वहां डिनर के वक़्त करीब 1,200 लोग हाथों में प्लास्टिक की कटोरियां
लेकर चीन समर्थक गीत गाते थे. वो सब रोबोट की तरह दिखते थे. उनकी तो आत्मा
ही मर गई थी. मैं उनमें से कई लोगों को जानता हूं. वो सब ऐसे व्यवहार करते
थे कि जैसे कि कार दुर्घटना में अपनी यादाश्त खो चुके हों.''
चीन का कहना है कि उसे अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है क्योंकि कुछ वीगर लोगों ने इस्लामिक स्टेट समूह के साथ हथियार उठा लिए हैं.
साल में शिनजियांग की राजधानी ऊरूमची में हुए दंगों में हान समुदाय
के 200 लोग मारे गए थे. उसके बाद से यहां हिंसा बढ़ी है. जुलाई में
पुलिस स्टेशन और सरकारी दफ़्तरों पर हुए हमलों में 96 लोग मारे गए थे.
अक्तूबर
2013 में बीजिंग के तियाननमेन स्क्वायर में एक कार भीड़ में घुसी और कई
लोगों के कुचल दिया. चीनी प्रशासन ने इसके लिए भी शिनजियांग के
अलगाववादियों को ज़िम्मेदार बताया गया था.
सरकार की ताज़ा कार्रवाई के पीछे फ़रवरी में शिनजियांग के ऊरूमची में हुई छुरेबाज़ी की घटनाएं हैं.
चीन का कहना है कि शिनजियांग में 'हिंसक आतंकवादी गतिविधियों' से निपट रहा है.
जिनेवा में एक संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में चीनी अधिकारी हू लियानहे ने कहा था
कि दस लाख लोगों को हिरासत में रखे जाने की बात 'कोरा झूठ' है.
हाल
ही में चीन के मानवाधिकार विभाग के एक अधिकारी ने कहा है, "आप कह सकते हैं
कि ये तरीका सबसे उपयुक्त नहीं है लेकिन धार्मिक चरमपंथ से निपटने के लिए
ऐसा किया जाना ज़रूरी है. क्योंकि पश्चिम के देश इस्लामी चरमपंथ से लड़ने
में असफल हो गए हैं. बेल्जियम और पेरिस में हुए हमले, इसका सबूत हैं.
पश्चिम इस विषय में असफल रहा है."
चीन अक्सर शिनजियांग पर कोई
सार्वजनिक राय नहीं देता. साथ ही शिनजियांग में बाहरी लोगों और मीडिया के
प्रवेश की पूरी तरह से नियंत्रित करता है.
दुनिया भर में वीगर समुदाय के प्रति चीनी रवैया की आलोचना बढ़ती जा रही
है. लेकिन अब तक किसी भी मुल्क़ ने आलोचना भरे शब्दों से आगे कोई क़दम नहीं उठाया है.
अमरीका में कांग्रेस की चीनी मामलों की कमेटी ने ट्रंप
प्रशासन से शिनजियांग में मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ी कंपनियों और
अधिकारियों पर पाबंदी लगाने की गुहार की है.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट
में लिखा है - "अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को हिरासत में रखा जा रहा है.
उनका टॉर्चर हो रहा है. उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर पाबंदी
लगी हुई है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हर पहलू निगरानी में है." संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन की नई प्रमुख मिशेल बेशलेट ने भी शिनजियांग
में पर्यवेक्षकों को शिनजियांग में जाने देने की अनुमति मांगी है. चीन ने
इस मांग को सिरे से ख़ारिज करते हुए ग़ुस्से का इज़हार किया है.
मिसाल के तौर पर सीरिया में देखा जा सकता है. अमरीका लाख चाहता रहा कि
सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बाहर किया जाए, लेकिन रूसी
समर्थन ने उन्हें बचा लिया. अब दुनिया भले ही दो ध्रुवीय नहीं है, लेकिन कई
मामलों में रूस और चीन आज भी अमरीकी नेतृत्व को चुनौती देते दिखते हैं.
रूस
यूँ तो भारत का पारंपरिक दोस्त रहा है, लेकिन उसकी क़रीबी हाल के वर्षों
में चीन से बढ़ी है. चीन और भारत के बीच 1962 में एक युद्ध हो चुका है और
भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था. दोनों देशों के बीच आज भी सीमा
विवाद का समाधान नहीं हो पाया है. ऐसे में रूस और चीन की दोस्ती को भारत कैसे देखता है? चीन और रूस की दोस्ती का असर भारत पर क्या पड़ेगा?
भारत
और अमरीका में क़रीबी के कारण भी रूस और भारत के बीच दूरियां बढ़ी हैं.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2008-2012 तक भारत के
कुल हथियार आयात का 79 फ़ीसदी रूस से होता था जो पिछले पांच सालों में
घटकर 62 फ़ीसदी हो गया है.
वहीं कल तक जो पाकिस्तान हथियारों की
ख़रीद अमरीका से करता था अब रूस और चीन से कर रहा है. पाकिस्तान अपनी सैन्य
आपूर्ति की निर्भरता अमरीका पर कम करना चाहता है.
स्टॉकहोम
इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार अमरीका और पाकिस्तान के बीच का हथियारों का सौदा एक अरब डॉलर से फिसलकर पिछले साल 2.1 करोड़ डॉलर तक
पहुंच गया है.
पूर्वी रूस और साइबेरिया में इस महीने की शुरुआत में
चीनी सेना एक युद्धाभ्यास में शामिल हुई. इसमें चीनी सेना के साजो-सामान भी
शामिल हुए थे. इसे 1981 के बाद का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास बताया जा रहा
है. इमेज कॉपीरइट दोनों देशों के इस सैन्य अभ्यास को चीन और रूस की नई रणनीतिक जुगलबंदी के तौर पर देखा जा रहा है. पश्चिम के कई पर्यवेक्षकों ने
तो इस युद्धाभ्यास को अमरीका के ख़िलाफ़ रूस और चीन की साझी तैयारी के तौर
पर पेश किया. कहा जा रहा है कि अमरीका ने चीन के ख़िलाफ़ जो ट्रेड
वॉर शुरू किया और रूस के ख़िलाफ़ जो आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, वैसे में
दोनों देशों का साथ आना लाजिमी है.
चीन और रूस के बीच पिछले 25
सालों में संबंधों में गर्माहट आई है. हालांकि दोनों देशों में और
के दशक में लड़ाई भी हुई है. सोवियत संघ के आख़िरी सालों से दोनों
देशों की क़रीबी बढ़ने लगी थी.
आज की तारीख़ में दोनों देशों के बीच
रणनीतिक साझेदारी है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोनों देशों ने संयुक्त
राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए साथ
मिलकर कई बार वीटो पावर का इस्तेमाल किया है.
दूसरे विश्व युद्ध की
समाप्ति के बाद रूस और चीन का वो पक्ष कई बार खुलकर सामने आया है कि दुनिया बहुध्रुवीय रहे. मध्य-पूर्व में जब अमरीका, ईरान को लेकर कठोर होता है तो
रूस और चीन दोनों मिलकर उदार रुख़ का परिचय देते हैं.